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प्रभु कि भक्ति ही सबसे सच्ची—– पंडित दाधीच

संगीतमय श्रीमद्ध भागवत कथा में बही भजनों की धारा

गांव आंतरोली कलां में चल रही सप्त दिवसिय संगीतमय श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ मे आज पांचवे दिन व्यास पीठ से पूज्य श्री पुरुषोत्तम जी दाधीच ने भगवान की लीलाओं की कथा का रसपान करवाया कथा में आज श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का, पूतना उद्धार एवं गोवर्धन लीला का भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं की संजीव झाँकियों के माध्यम से समझा।श्रीकृष्ण ने अपने बालकाल से लेकर युवावस्था तक न जाने कितनी ही लीलाएँ कीं। भारत भूमि पर उनके जन्म की लीला भी बहुत आनंद प्रदान करने वाली है। श्रीकृष्ण द्वारा पूतना वध, मृतिका भक्षण, माखन चोरी, कालिय नाग का मर्दन, कुबेर पुत्रों का उद्धार, खेल-खेल में ही कई राक्षसों का वध, इन्द्र का घमण्ड चूर-चूर करना तथा गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाना जैसी कई चमत्कारपूर्ण लीलाएँ की गईं।श्रीकृष्ण ने अपने बालकाल से लेकर युवावस्था तक न जाने कितनी ही लीलाएँ कीं। भारत भूमि पर उनके जन्म की लीला भी बहुत आनंद प्रदान करने वाली है। श्रीकृष्ण द्वारा पूतना वध, मृतिका भक्षण, माखन चोरी, कालिय नाग का मर्दन, कुबेर पुत्रों का उद्धार, खेल-खेल में ही कई राक्षसों का वध, इन्द्र का घमण्ड चूर-चूर करना तथा गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाना जैसी कई चमत्कारपूर्ण लीलाएँ की गईं।उसने पूतना नाम की एक क्रूर राक्षसी को ब्रज में भेजा। पूतना ने राक्षसी वेष तज कर अति मनोहर नारी का रूप धारण किया और आकाश मार्ग से गोकुल पहुँच गई। गोकुल में पहुँच कर वह सीधे नन्दबाबा के महल में गई और शिशु के रूप में सोते हुये श्रीकृष्ण को गोद में उठाकर अपना दूध पिलाने लगी। उसकी मनोहरता और सुन्दरता ने यशोदा और रोहिणी को भी मोहित कर लिया, इसलिये उन्होंने बालक को उठाने और दूध पिलाने से नहीं रोका। पूतना के स्तनों में हलाहल विष लगा हुआ था। अन्तर्यामी श्रीकृष्ण सब जान गये और वे क्रोध करके अपने दोनों हाथों से उसका कुच थाम कर उसके प्राण सहित दुग्धपान करने लगे। उनके दुग्धपान से पूतना के मर्म स्थलों में अति पीड़ा होने लगी और उसके प्राण निकलने लगे। वह चीख-चीख कर कहने लगी- “अरे छोड़ दे! छोड़ दे! बस कर! बस कर!” वह बार-बार अपने हाथ पैर पटकने लगी और उसकी आँखें फट गईं। उसका सारा शरीर पसीने में लथपथ होकर व्याकुल हो गया। वह बड़े भयंकर स्वर में चिल्लाने लगी। उसकी भयंकर गर्जना से पृथ्वी, आकाश तथा अन्तरिक्ष गूँज उठे। बहुत से लोग बज्रपात समझ कर पृथ्वी पर गिर पड़े। पूतना अपने राक्षसी स्वरूप को प्रकट कर धड़ाम से भूमि पर बज्र के समान गिरी, उसका सिर फट गया और उसके प्राण निकल गये। जब यशोदा, रोहिणी और गोपियों ने उसके गिरने की भयंकर आवाज को सुना, तब वे दौड़ी-दौड़ी उसके पास गईं। उन्होंने देखा कि बालक कृष्ण पूतना की छाती पर लेटा हुआ स्तनपान कर रहा है तथा एक भयंकर राक्षसी मरी हुई पड़ी है। उन्होंने बालक को तत्काल उठा लिया और पुचकार कर छाती से लगा लिया। वे कहने लगीं- “भगवान चक्रधर ने तेरी रक्षा की। भगवान गदाधर तेरी आगे भी रक्षा करें।” इसके पश्चात् गोप ग्वालों ने पूतना के अंगों को काट-काट कर गोकुल से बाहर ला कर लकड़ियों में रख कर जला दिया।
वहीं श्रोताओं ने सजीव झांकियो दर्शन कर सभी भागवत प्रेमियों ने भाव से भर नृत्य कर के आनन्द लिया । कथा स्थल पर ग्राम रुणिचा से पधारे भागवत कथा मर्मज्ञ पूज्य श्री नित्यानंद जी महाराज अजमेर से पधारे ऋषिकेश जी महाराज बागोट आश्रम से पधारे पूज्य श्री गोपालदास जी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त कर अपने आपको कृतार्थ अनुभव किया। कथा व्यास जी ने बाहर से पधारे विशिष्ट भागवत श्रोताओं का दुपट्टा ओढाकर सम्मानित किया ।व्यास पीठ से कथा का प्रवंचन करते-- पं. पुरुषोत्तम दाधीच

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